चन्देल

ध्वज

चन्देल वंश पूर्वी भारत का प्रसिद्ध हिंदू राजपुत राजवंश था, जिसने 08वीं से 13वीं शताब्दी तक स्वतंत्र रूप से भारत पे शासन किया। जेजाकभुक्ति के चन्देल राजवंश की स्थापना हैहयवंशी राजा चन्द्रवर्मन चन्देल ने की थी। सीवी वैद्य, डॉ0 ओझा एवं अन्य इतिहासकारों के अनुसार चन्देल कबीला चन्द्रवंशी क्षत्रिय कबीले में सबसे ऊंचा तथा उनका मुखिया कबीला था। उनके द्वारा शासित क्षेत्र जेजाकभुक्ति कहलाता था। चन्देल सम्राट ना ही सफल विजेता और कुशल शासक थे अपितु वास्तुकला तथा धर्म की और भी उनका रुझाव ज्यादा था। चन्देल राजाओं का राजभवन कलिंजर, जेजाकभुक्ति (उत्तर प्रदेश) था।[2][3][4][5]

610 के अंत तक वे पुष्यभूति राजवंश और कलचुरि राजवंश के सामंत राजा तथा सेनापति थे। चन्देल वंश का साम्राज्य जहा भी फैलता वो जेजाकभुक्ति के नाम से जाना जाता था। जेजाभुक्ति चन्देल राज्य के प्रथम महाराज जेजा या जयशक्ति के नाम पे पढ़ा इसी कारण इन्हें जेजाकभुक्ति के चन्देल कहा जाता है। 1545 के अंत में जो बचा हुआ छोटा सा चन्देल राज्य यानी जेजाकभुक्ति बुंदेलो के पास गया वो बुंदेलखंड हो गया। चन्देल वंश के शासकों की राजधानी बुंदेलखंड में थी जिसके कारण बुंदेलखंड के इतिहास में विशेष योगदान रहा है। 1203 में चन्देल साम्राज्य के पतन के बाद चन्देलों ने लगभग चार शताब्दियों 1205-1545 तक कालिंजर पर शासन किया।

चन्देल राजपुत आर्यावर्त के प्रमुख चन्द्रवंशी राजा यदु के वंशधर सम्राट हय के वंश से है । राजा हय के वंश में भगवान श्री कार्तवीर्य अर्जुन हुए कार्तवीर्य अर्जुन के वंश में महाराज वृषणी हुए जिनके नाम से कुल का नाम वृष्णी हुआ जिसका उल्लेख राजा ढंगा के शिलालेख से भी मिलता है, वृष्णी के वंश में भगवान श्री विष्णु के द्वारपाल जय के अवतार शिशुपाल हुए, शिशुपाल के पुत्र दृष्टकेटु से चन्देल वंश चला। [4][6] खजुराहो शिलालेख के अनुसार चन्देल राजा धनंग का जन्म वृष्णी कुल में हुआ था। [7] चन्द्रवर्मन जो की शिशुपाल से 98 पीढ़ी बाद चंदेरी के राजा बने, वे हैहयवंशी हरिहर चन्द चन्देल के ५वे वंशधर थे।[3][4][8] चन्देल हैहयवंशी सम्राट महिष्मत के वंशज थे। [9][5] सीवी वैद्य और जीएस ओझा जैसे इतिहासकार चन्देल राजपूतों को शुद्ध और उच्चकुल का चन्द्रवंशी मानते हैं। [10] [11][12]

ब्रिटिश इंडोलॉजिस्ट वी.ए. स्मिथ ने सिद्धांत दिया कि चंदेल या तो भर या गोंड मूल के थे,इस सिद्धांत का समर्थन सी वी वैद्य सहित कुछ विद्वानों ने नहीं किया था क्योंकि यह भार और गोंड मूल सिद्धांत दुर्गावती के गोंड राज्य के राजा से विवाह पर आधारित था दलपत शाह जो एक गोंड नहीं था बल्कि एक कच्छवाहा राजपूत था जिसे अकबरनामा के अनुसार राजा अमनदास गोंड ने गोद लिया था। [13] कलचुरी राजपूत के पतन के बाद शेष कलचुरी राजपूत साम्राज्य ने आदिवासियों को अपनाया जिसके कारण गोंडो की संख्या ज्यादा हुई और छेत्र गोंडवाना कहलाया और साम्राज्य गढ़ मंडला जिससे गोंड साम्राज्य की शुरुआत हुई जिसमें दलपत शाह एक कछवाहा राजपूत को एक गोंड राजा अमन दास या संग्राम शाह द्वारा अपनाया गया था। [14][15]

जेजाकभुक्ति के चन्देल 7वी शताब्दी से मूल रूप से गुर्जर-प्रतिहारों के सामंत राजा तथा सेनापति थे।[16] चन्द्रवर्मन (नन्नुकदेव) (831-845 CE), महोबा में चन्देल राजवंश का संस्थापक था जिसने चेदी या चन्देल राजवंश की राजधानी चन्देरी से महोबा में स्थापित की, वह विंध्याचल के आसपास केंद्रित राज्य का शासक था।[17]

चन्देल शिलालेख के अनुसार, चन्द्रवर्मन के उत्तराधिकारी वक्पति ने कई दुश्मनों को हराया। [18] वक्पति के पुत्र जयशक्ति (जेजा) और विजयशक्ति (विज) ने चन्देल शक्ति को समेकित किया[19] एक महोबा शिलालेख के अनुसार, चन्देल क्षेत्र को जयशक्ति के बाद "जेजाकभुक्ति" नाम दिया गया था। विजयशक्ति के उत्तराधिकारी रहील को प्रशंसात्मक शिलालेखों में कई सैन्य जीत का श्रेय दिया जाता है। रहीला के पुत्र हर्ष ने संभवत: राष्ट्रकूट आक्रमण के बाद या अपने सौतेले भाई भोज द्वितीय के साथ महिपाल के संघर्ष के बाद प्रतिहार राजा महीपाल के शासन को बहाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

हर्ष के पुत्र यशोवर्मन (925-950 CE) ने प्रतिहार आधीनता स्वीकार करना जारी रखा, लेकिन व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र हो गया। उसने कलंजारा के महत्वपूर्ण किले को जीत लिया। एक 953-954 सदी के खजुराहो के शिलालेख उसे कई अन्य सैन्य सफलताओं के साथ श्रेय देता है, जिसमें गौडा (पाला के साथ पहचाना गया), खासा, छेदी (त्रिपुरी का कलचुरि), कोसला (संभवतः सोमवमेश), मिथिला (संभवतः छोटे उपनदी शासक), मालव (पारमारों के साथ पहचाने गए), कौरव, कश्मीरी और गुर्जर थे । हालांकि ये दावे अतिरंजित प्रतीत होते हैं, क्योंकि उत्तरी भारत में व्यापक विजय के समान दावे अन्य समकालीन राजाओं जैसे कलचुरि राजा युवा-राजा और राष्ट्रकूट राजा कृष्ण III के रिकॉर्ड में भी पाए जाते हैं। यशोवर्मन के शासनकाल ने प्रसिद्ध चंदेला-युग कला और वास्तुकला की शुरुआत को चिह्नित किया। उन्होंने खजुराहो में लक्ष्मण मंदिर की स्थापना की।

पहले के चंदेला शिलालेखों के विपरीत, यशोवर्मन के उत्तराधिकारी धनंगा (950-999 CE) के रिकॉर्ड में किसी भी प्रतिहार अधिपति का उल्लेख नहीं है। यह इंगित करता है कि धनंगा ने औपचारिक रूप से चंदेला संप्रभुता की स्थापना की। खजुराहो के एक शिलालेख में दावा किया गया है कि कोशल, क्रथा (विदर्भ क्षेत्र का हिस्सा), कुंतला, और सिम्हाला के शासकों ने धनंगा के शासन को विनम्रता से स्वीकारा। यह भी दावा करता है कि आंध्र, अंग, कांची और राह के राजाओं की पत्नियाँ युद्धों में उनकी सफलता के परिणामस्वरूप उनकी जेलों में रहीं। ये एक दरबारी कवि द्वारा विलक्षण अतिशयोक्ति प्रतीत होता हैं, लेकिन बताता है कि धनंगा ने व्यापक सैन्य अभियान किए। अपने पूर्ववर्ती की तरह, धंगा ने भी खजुराहो में एक शानदार मंदिर की स्थापना की, जिसे विश्वनाथ मंदिर के रूप में पहचाना जाता है।

धंगा के उत्तराधिकारी गंडा को अपने द्वारा विरासत में मिले क्षेत्र को बनाए रखता है ऐसा प्रतीत होता है। उनके पुत्र विद्याधर ने कन्नौज (संभवतः राज्यापाल) के प्रतिहार राजा की हत्या कर दी, क्योंकि वह ग़ज़नी के ग़ज़नावी आक्रमणकारी महमूद से लड़ने के बजाय अपनी राजधानी से भाग गया था। बाद में महमूद ने विद्याधर के राज्य पर आक्रमण किया, मुस्लिम आक्रमणकारियों के अनुसार, यह संघर्ष विद्याधर द्वारा महमूद को श्रद्धांजलि देने के साथ समाप्त हो गया।[20] विद्याधारा को कंदरिया महादेव मंदिर की स्थापना के लिए जाना जाता है।

इस अवधि के दौरान चंदेला कला और वास्तुकला अपने चरम पर पहुंच गया। लक्ष्मण मंदिर (930–950 CE), विश्वनाथ मंदिर (999-1002 CE) और कंदरिया महादेव मंदिर (1030 CE) का निर्माण क्रमशः यशोवर्मन, धनगा और विद्याधारा के शासनकाल के दौरान किया गया था। ये नागर-शैली के मंदिर खजुराहो में सबसे अधिक विकसित शैली के प्रतिनिधि हैं।[21]

लक्ष्मण मंदिर

पार्श्वनाथ मंदिर, खजुराहो

विश्वनाथ मंदिर

कंदरीय महादेव मंदिर

विद्याधर ( 1003- 1035 ई0) वह मध्यभारत का सबसे शक्तिशाली और महान हिंदू राजपुत सम्राट था, उन्होंने कलंजर, जेजाकभुक्ति से शासन किया। उन्होंने कन्नौज के राजा राजपाल, मालवा के राजा भोज और त्रिपुरा के राजा गंगेयदेव को हराया। [22][23] मुसलमान लेखक उसको 'चन्द्र' एवं 'विदा' नाम से पुकारते हैं। वह अपने दादा (धंग) के सामान वीर और कुसल शासक था। अली इब्न उल-अतहर के अनुसार चन्देल साम्राज्य की सीमा की सीमा भारत में सबसे बड़ी थी। [24] [25] [26] [27][28] उसके समय चन्देलो ने कलचुरी और परमारों पर विजय पाई और 1019 तथा 1022 में महमूद का मुकाबला किया। चन्देल साम्राज्य की सीमा विस्तृत हो गई थी। विद्याधर के बाद चन्देल साम्राज्य की कीर्ति और शक्ति घटने लगी परन्तु उसे उसके पौत्र किर्त्तिवर्मन ने पुन प्रतिष्ठित कर लिया।[29] 1019 में महमूद गजनी का विद्याधर से युद्ध होता है जिसमे महमूद गजनी को विद्याधर से संदि करनी पड़ी और अन्य नरेशो से जीते हुए 15 किले विद्याधर को दे दिया विद्याधर ही अकेला ऐसा भारती सम्राट था जिसने महमूद गजनी की महत्वाकांक्षी सफलता पूर्वक प्रतिरोध के प्रतिरोध किया

विद्याधर के शासनकाल के अंत तक, गज़नवी आक्रमणों ने चंदेल साम्राज्य को कमजोर कर दिया था। इसका फायदा उठाकर, सामंती कलचुरी राजा गंगेय-देव (जो विद्याधर द्वारा पराजित हुए) ने अपने साम्राज्य के पूर्वी हिस्सों पर विजय प्राप्त की.[30] एक खंडित महोबा शिलालेख का दावा है कि विजयपाल ने एक युद्ध में गंगेय का गौरव तोड़ा था.[31] विजयपाल का बड़ा पुत्र देवववर्मन गंगेया के पुत्र लक्ष्मी-कर्ण द्वारा पराजित कर दिया गया था।[26] उसके छोटे भाई कीर्तिवर्मन ने लक्ष्मी-कर्ण को हराकर चंदेला शक्ति को फिर से जीवित कर दिया।[26] कीर्तिवर्मन के पुत्र सल्लक्ष्णवर्मन ने संभवतः उनके प्रदेशों पर हमला कर परमारों और कलचुरियों के खिलाफ सैन्य सफलताएँ हासिल कीं। एक मऊ शिलालेख से पता चलता है कि उन्होंने अंतरवेदी क्षेत्र (गंगा-यमुना दोआब) में भी सफल अभियान चलाया था। उनका पुत्र जयवर्मन धार्मिक स्वभाव का था और शासन के थक जाने के बाद उसने राजगद्दी छोड़ दी।

ग्वालियर के कच्छपघाट शायद विजयपाल के शासनकाल के दौरान संप्रभु बन गए।सास-बहू शिलालेख में कच्छपघाट शासक मूलदेव के लिए उच्च-ध्वनि वाली उपाधियों के उपयोग से यह संकेत मिलता है। लेकिन यह सच नहीं है कि शायद उन्होंने विद्रोह कर दिया और उपाधि ले ली लेकिन बाद में उन्हें विजयपाल ने कुचल दिया। क्योंकि ग्वालियर के कच्छपाघाट सामान्य थे और 1155 तक चंदेलों के सामंत थे, बाद में चंदेलों ने ग्वालियर में कच्छपघाट के सामंती शासन को समाप्त कर दिया। संभवतः पारिवारिक युद्ध के दौरान (ग्वालियर के कच्छपघाट भी 950-1155 सीई से चंदेलों के जागीरदार और सेनापति थे।). [32][33] [34]

विजयपाल का बड़ा पुत्र देवववर्मन गंगेयागंगेय के पुत्र लक्ष्मी-कर्ण द्वारा पराजित कर दिया गया था।[26] उसके छोटे भाई कीर्तिवर्मन ने लक्ष्मी-कर्ण को हराकर मार दिया तथा चन्देल साम्राज्य को फिर से जीवित कर दिया।[26] कीर्तिवर्मन के पुत्र सल्लक्ष्णवर्मन

ने संभवतः उनके प्रदेशों पर हमला कर परमारों और कलचुरियों के खिलाफ सैन्य सफलताएँ हासिल कीं। एक मऊ शिलालेख से पता चलता है कि उन्होंने

अंतरवेदी क्षेत्र (गंगा-यमुना दोआब) में भी सफल अभियान चलाया था। उनका पुत्र जयवर्मन धार्मिक स्वभाव का था और शासन के थक जाने के बाद उसने राजगद्दी छोड़ दी।

विजयपाल का बड़ा पुत्र देवववर्मन गंगेया के पुत्र लक्ष्मी-कर्ण द्वारा पराजित कर दिया गया था।[26] उसके छोटे भाई कीर्तिवर्मन ने लक्ष्मी-कर्ण को हराकर चंदेला शक्ति को फिर से जीवित कर दिया।[26] कीर्तिवर्मन के पुत्र सल्लक्ष्णवर्मन ने संभवतः उनके प्रदेशों पर हमला कर परमारों और कलचुरियों के खिलाफ सैन्य सफलताएँ हासिल कीं। एक मऊ शिलालेख से पता चलता है कि उन्होंने अंतरवेदी क्षेत्र (गंगा-यमुना दोआब) में भी सफल अभियान चलाया था। उनका पुत्र जयवर्मन धार्मिक स्वभाव का था और शासन के थक जाने के बाद उसने राजगद्दी छोड़ दी।

जयवर्मन की मृत्यु उत्तराधिकारी-विहीन हुई प्रतीत होती है, क्योंकि उसका उत्तराधिकारी कीर्तिवर्मन का छोटा पुत्र, उसका चाचा पृथ्वीवर्मन हुआ था।[35]चंदेला शिलालेख उसके लिए किसी भी सैन्य उपलब्धियों का वर्णन नहीं करता है, ऐसा प्रतीत होता है कि वह एक आक्रामक विस्तारवादी नीति को अपनाए बिना मौजूदा चंदेला क्षेत्रों को बनाए रखने पर केंद्रित था।[36]

जब तक पृथ्वीवर्मन के पुत्र मदनवर्मन (1128–1165 CE) सिंहासन का उत्तराधिकारी हुआ, तब तक दुश्मन के आक्रमणों से पड़ोसी कलचुरी और परमारा राज्य कमजोर हो गए थे। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए, मदनवर्मन ने कलचुरी राजा गया-कर्ण को पराजित किया, और संभवतः बघेलखंड क्षेत्र के उत्तरी भाग को कब्जा कर लिया। हालांकि, चंदेलों ने इस क्षेत्र को गया-कर्ण के उत्तराधिकारी नरसिम्हा के हाथो हार गया। मदनवर्मन ने भीमसा (विदिशा) के आसपास, परमारा साम्राज्य की पश्चिमी परिधि पर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। यह संभवत: परमारा राजा यशोवर्मन या उनके पुत्र जयवर्मन के शासनकाल के दौरान हुआ था। एक बार फिर, चंदेलों ने लंबे समय तक नवगठित क्षेत्र को बरकरार नहीं रखा, और यशोवर्मन के बेटे लक्ष्मीवर्मन ने इस क्षेत्र को फिर से कब्जा कर लिया।

गुजरात के चालुक्य राजा जयसिम्हा सिद्धराज ने भी परमारा क्षेत्र पर आक्रमण किया, जो कि चंदेला और चालुक्य राज्यों के बीच स्थित था। इसने उन्हें मदनवर्मन के साथ संघर्ष हुआ। इस संघर्ष का परिणाम अनिर्णायक प्रतीत होता है, क्योंकि दोनों राज्यों के रिकॉर्ड जीत का दावा करते हैं। कलंजारा शिलालेख से पता चलता है कि मदनवर्मन ने जयसिम्हा को हराया था। दूसरी ओर, गुजरात के विभिन्न वर्णसंकरों का दावा है कि जयसिम्हा ने या तो मदनवर्मन को हराया या उससे उपहार प्राप्त किया। मदनवर्मन ने अपने उत्तरी पड़ोसियों, गढ़वलाओं के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखे।

मदनवर्मन के पुत्र यशोवर्मन द्वितीय ने या तो शासन नहीं किया, या बहुत कम समय के लिए शासन किया। मदनवर्मन के पौत्र परमर्दि-देव अंतिम शक्तिशाली चंदेला राजा थे।

परमर्दिदेव (शासनकाल 1165-1203 ईस्वी) ने छोटी उम्र में चन्देल सिंहासन पर आरूढ़ हुआ। ११६२ में सम्राट यशोवर्मन द्वीतीय और उनके भतीजे दस्सराज और वत्सराज की हत्या हो गई और यशोवर्मन के पुत्र परमर्दीदेव उस समय मात्र ५ साल के थे जिसके चलते चन्देल साम्राज्य के सामंत राजा विद्रोह करके स्वतंत्र हो गए। महाराज परमर्दिदेव ने पुन सभी राजाओं को हराकर उन्हे अपना सामंत बना लिया अब सम्राट परमर्दिदेव के सामने दो राजा थे एक काशी के राजा जयचंद दूसरा अजमेरा के राजा पृथ्वीराज चौहान जिसमे उन्होंने जयचंद से मित्रता कर ली। परमर्दिदेव का पुत्र ब्रम्हा या ब्रम्हजीत पृथ्वीराज की पुत्री बेला से प्रेम करता था परंतु जयचंद से चन्देलो की मित्रता होने के कारण उसने विवाह के लिए मना कर दिया। अब युवराज ब्रम्हजित और सेनापति आल्हा जो की सम्राट परमर्दिदेव के भतीजे थे उन्होंने दिल्ली पे चढ़ाई कर दी और पृथ्वीराज की बेटी से ब्रम्हजित का विवाह करा दिया, अब विवाह तो हो गया इसी बीच पृथ्वीराज ने ११७२ में महोबा गढ़ के सिरसागढ़ किले पे हमला कर दिया और महोबा की लड़ाई जीतते हुए बेला को दिल्ली ले गए। इस बार परमर्दिदेव, ब्रम्हजित, आल्हा और ऊदल ने पुन अजमेर पे हमला किया और अजमेर को हराते हुए अपनी वधु बेला चौहान को राजधानी महोबा ले आए। पृथ्वीराज ने ११७६ में पुन माहोबा पे हमला किया इस बार युद्ध कीरतसागर के पास हुआ जिसमे सेनापति ऊदल और युवराज ब्रम्हजीत राजकुमार इंद्रजीत और गहड़वाल के कन्नौज सेना के राजकुमार लखन गहरवार मारे गए, अपनी भाईयो की मृत्यु से गुस्सा कर आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान की

टुकड़ी पर हमला कर दिया और उन्हें मारने ही वाले थे की गुरु गोरखनाथ ने उनका हाथ रोक लिया जिसके बाद आल्हा रणभूमि से चले गए और सन्यास ले

लिया जिसके बाद पुन युद्ध शुरू हुआ चन्देलों और चौहानों में, परमर्दिदेव चन्देल ने पृथ्वीराज चौहान को बुरी तरह परास्त कर दिया और उससे संधि लिखवाई जिसके तहत वो कभी महोबा की और आंख उठाकर नही देखेगा, भले ही पृथ्वीराज ने अपने दामाद ब्रम्हजित की हत्या करवादी परंतु परमर्दिदेव ने पृथ्वीराज चौहान को रिश्तेदार और गुरु गोरखनाथ की वजह से जीवित जाने दिया। परमर्दिदेव १२०३ तक कुतुबद्दीन ऐबक के विरुद्ध लड़ा परंतु सेनापति अजय देव ने परमर्दिदेव को मार दिया और चन्देल साम्राज्य पर कब्जा कर लिया, सम्राट परमर्दिदेव की मृत्यु होते हुई महोबा की घुरिड सेना से हार गई।

चंदेल सत्ता दिल्ली की सेना के खिलाफ अपनी हार से पूरी तरह उबर नहीं पाई थी। त्रिलोकीवर्मन, वीरवर्मन और भोजवर्मन परमर्दिदेव के उत्तराधिकारी थे। अगले शासक हम्मीरवर्मन (1288-1311 CE) ने शाही उपाधि महाराजाधिराज का उपयोग नहीं किया, जो बताता है कि चंदेल राजा की उस समय तक निम्न दर्ज़े की स्थिति थी। बढ़ते मुस्लिम प्रभाव के साथ-साथ अन्य स्थानीय राजवंशों, जैसे बुंदेलों, बघेलों और खंगार राजाओ के उदय के कारण चंदेला शक्ति में गिरावट जारी रही।

हम्मीरवर्मन के वीरवर्मन द्वितीय सिंहासन पर आरूढ़ हुआ, जिसके शीर्षक उच्च राजनीतिक दर्ज़े की स्थिति का संकेत नहीं देते हैं। परिवार की एक छोटी शाखा ने कलंजारा पर शासन जारी रखा । इसके शासक ने कीरत राय चंदेल ने 1545 ईस्वी में शेरशाह सूरी को मार दिया। कीर्तिवर्मन या कीरत राय की पुत्री दुर्गावती थी, दुर्गावती ने कलाचूरियो के गढ़ मंडला परिवार में दलपत शाह कच्छवाहा से शादी की।[14][15]

चंदेल शासन परंपरागत आदर्शों पर आधारित था। चंदेलों को उनकी कला और वास्तुकला के लिए जाना जाता है। उन्होंने विभिन्न स्थानों पर कई मंदिरों, जल निकायों, महलों और किलों की स्थापना की। उनकी सांस्कृतिक उपलब्धियों का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण खजुराहो में हिंदू और जैन मंदिर हैं। तीन अन्य महत्वपूर्ण चंदेला गढ़ जयपुरा-दुर्गा (आधुनिक अजैगढ़), कलंजरा (आधुनिक कालिंजर) और महोत्सव-नगर (आधुनिक महोबा) थे।

खजुराहो का दुलहदेव मंदिर

अजयगढ़ महल

खजुराहो का प्रतापेश्वर मंदिर

अजयगढ़ मंदिर

कुलपहाड़ का यज्ञ मण्डप


ब्रह्मा की सभा (खजुराहो)

प्रस्तर पर नक्काशी (अजयगढ़)

जैन तीर्थंकर एवं सरस्वती (अजयगढ़)

जैन धर्म के ७ स्वर्ग (अजयगढ़)

जैन श्रमण (अजयगढ़)

Cattle with treasure sign, (अजयगढ़)

Loving couple, खजुराहो

सुरसुन्दरी अप्सरा, खजुराहो

नृत्य करते हुए गणेश, खजुराहो

सुरसुन्दरी और व्याल, खजुराहो

खजुराहो के शिलालेख

खजुराहो का कंदरीया महादेव मंदिर
20 वीं शताब्दी के कलाकार द्वारा चक्रवर्ती सम्राट कीर्तिवर्मन चन्देल की खजुराहो मंदिर की यात्रा की कल्पना।ल